Tuesday, January 1, 2008

ग़ज़ल - चार सौ बीसी करी थी

चार सौ बीसी करी थी
जेब तब मेरी भरी थी

जिस्म तो जिंदा खड़ा था
रूह बस मेरी मरी थी

फ़न ही उसका " फन "था यारो
उसमें ये जादूगरी थी


ख्वाब दे कर उड़ गयी वो

प्यार वाली जो परी थी

दर्द से मैं रो रहा था
लोग समझे मसखरी थी


कवि दीपक गुप्ता - 9811153282
http://www.kavideepakgupta.com/

3 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

अब 8 सौ चालीसी का दीपक जलाओगे
तो भी जेब खाली पाओगे
दूसरे की जेब से उड़ाओगे
तो खुशी और मेवा मिलेगा थोक में
करना कलेवा, जेल में या जाल में
हाथ में माल होगा, न कोई मलाल होगा
गालों पर रंगीनी नहीं लाल गुलाल होगा
अगर कदम आगे बढ़ाओ तो पाओगे
16 सौ अस्सी दरवाजा खुला पाओगे

नीरज गोस्वामी said...

दीपक जी
छोटी बहार में ग़ज़ल कहना इतना आसन नहीं होता लेकिन आप ने शब्द और भावों का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया है. भाई बहुत अच्छे. लिखते रहें.
नीरज

Tilak Raj said...

बहुत अच्‍छे शेर कहे हैं। चार सौ बीसी मुआफ। आर सौ बीसी करके मान लेना बड़ी बात है लेकिन जो करते हैं वो मानते नहीं, जो नहीं करते वो इसलिये मान लेते हैं कि की तो है ही नहीं। रूह मरने की हालत भी वही है।
'दर्द से मैं रो रहा था
लोग समझे मसखरी थी'
तिलक राज कपूर