रिश्ते भी आजकल " Use & Through " की तरह हो गए हैं
और लोग " Thirsty Crow " की तरह हो गए हैं
हमें जब प्यास लगती है
तो हम, रिश्तों के कुओं में
स्वार्थ के पत्थर डालते हैं
और जब पेट भरा हो
तो दूसरों पर कीचड उछालते हैं
सोचता हूँ आज के हालात्
कितने बदतर हो गए हैं
संवेदनाएं मर चुकी
और आदमी पत्थर हो गए हैं
हालांकि पत्थरों में भी जान होती है
उनकी भी पहचान होती है
एक पत्थर होता है - मील का
जो दिखाता है रास्ता
एक पत्थर होता है - बुत नुमा
जिसके प्रति होती है आस्था
एक पत्थर वो ,
जिसे मजदूर अपना तकिया बनाता है
और एक पत्थर वो
जो अमीरों के पैरों के नीचे पड़ा - पड़ा
किस्मत पर आंसू बहाता है
कुछ पत्थर होते हैं चट्टान
जो लहरों के वेग को झेलते हैं
और कुछ पत्थर वो
जिनसे छोटे-छोटे बच्चे खेलते हैं
एक पत्थर होता है - नींव का
जिस पर आदमी
अपने सपनों के महल खड़े करता है
और एक पत्थर वो - जिस पर कलाकार
अपनी कला को गड़ता है
सुना है , पुराने ज़माने में आदमी
आग जलाने के लिए
पत्थर का उपयोग करता था
और अब , आग भड़काने के लिए
पत्थर का प्रयोग करता है
तो आओ
पत्थरों की इस दुनिया में
हम भी एक पत्थर बनें
पर हमें जब भी कोई रगडे
तो हम आग बन कर जलें
मगर बुझे हुए चूल्हों में
और इंसानियत की बुझी हुई मशालों में
और इतिहास में एक मील पत्थर बन कर गडें
हे प्रभु , वर दे
कभी भी किसी की अक्ल पर पत्थर न पडें .......
कवि दीपक गुप्ता
9811153282 - 9311153282
www.kavideepakgupta.com
Thursday, May 15, 2008
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3 comments:
दीपक जी,
रचना में अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग ने पंक्तियों का आकर्षण बढाया है। रचना का अंत इसके प्राण हैं...
***राजीव रंजन प्रसाद
बहुत खूब, दीपक भाई-बहुत गहरा दर्शन है रचना में. अंत आते तक तो गंभीर कर दिया. वाह!!!
deepak sir ,
u acted for me as a guru ,my guide ,my friend ,my wellwisher ,my everything...
u write excellent and i love all your thoughts ...
shayd shabd kam pad jaenge apke lie kuch kehna pade to..i can jst say may god bless you with this skill and nature in all births...
thank you ...
sonal arora
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