
Saturday, July 18, 2009
ग़ज़ल - आदमी के पर नहीं होते
आदमी के पर नहीं होते
हौसला परवाज़ देता है
आँख में सपने अगर हों तो
रास्ता आवाज़ देता है
बात कितनी भी पुरानी हो
वो नए अंदाज़ देता है
सोचता हूँ मेरे दुश्मन को
कौन मेरे राज़ देता है
लौटकर आया है कोई क्या
क्यों उससे आवाज़ देता है
जब ग़ज़ल को शक्ल देता हूँ
तो खुदा अल्फाज़ देता है
कवि दीपक गुप्ता
9811153282 , 9311153282
www. kavideepakgupta.com
Delhi , India
हौसला परवाज़ देता है
आँख में सपने अगर हों तो
रास्ता आवाज़ देता है
बात कितनी भी पुरानी हो
वो नए अंदाज़ देता है
सोचता हूँ मेरे दुश्मन को
कौन मेरे राज़ देता है
लौटकर आया है कोई क्या
क्यों उससे आवाज़ देता है
जब ग़ज़ल को शक्ल देता हूँ
तो खुदा अल्फाज़ देता है
कवि दीपक गुप्ता
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Thursday, July 16, 2009
नेकी कर और गाली सुन
आज भी दिन की शुरुआत मानसिक तनाव से हुई , हुआ यूँ कि किसी मित्र को २ महीने पहले कुछ हजारों रुपयों की अनायास जरूरत आन पड़ी तो उसने मुझसे एक निश्चित तारीख को पैसे वापिस देने का वादा करके उधार पैसे ले लिए ....मैंने भी उसकी मद्दद कर दी .....पर जब निश्चित तारीख को मैंने उससे अपने पैसे वापिस मांगे तो उसने कुछ दिनों की मोहलत और लेकर एक और तारीख को पैसे देने का वादा किया , आज फिर जब मैंने उससे पैसे मांगे तो सुनने को मिला कि अभी पैसे नहीं है जब होंगे तो दूँगा और क्या तेरी ज़िन्दगी इसी उधार के पैसे पर टिकी हुई है............यानि कि अपने पैसे वापिस मांगने के लिए भी मुझे भिखारी की तरह गिडगिडाना पड़ा.........पर मजबूरी कि मैं उसे मित्र कहता हूँ.......और मेरा ये अनुभव नया नहीं है .....कई बार मेरे साथ ऐसा हो चुका है बस सभी अनुभव अलग अलग लोगों के साथ हुए है.......................तो मित्रों कुल मिलकर इतने अनुभव होने के बाद ये सीखा कि कभी भी ऐसे उन अपनों की मदद नहीं करनी चाहिए जो आपकी इंसानियत और उदारता का ग़लत लाभ लेते है और मदद करने वाले की स्थिति को महज मजाक समझकर अपना पल्ला झाड़ लेते है.......
तो अभी से (w.e.f.) पैसे वाली मित्रता को मेरा फुल स्टाप..................
तो अभी से (w.e.f.) पैसे वाली मित्रता को मेरा फुल स्टाप..................
Monday, July 13, 2009
तंज के शेर
इक् ज़रा सी बात पर
आ गए औकात पर
आप भी हंसने लगे
अब मेरे जज़्बात पर
अब भरोसा क्या करें
आदमी की जात पर
कवि दीपक गुप्ता
9811153282 - 9311153282
www.kavideepakgupta.com
आ गए औकात पर
आप भी हंसने लगे
अब मेरे जज़्बात पर
अब भरोसा क्या करें
आदमी की जात पर
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Saturday, July 11, 2009
गीत - मौसम के मस्तक पर मैंने
मौसम के मस्तक पर मैंने
नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूँ
अक्सर मुझसे बतियाता है
मस्त हवाओं का हरकारा
आते- जाते बतला जाता
क्या है प्रियतम हाल तुम्हारा
झंझाओं को झेल रही है
नित दीपक की जलती बाती
कितना जीवन शेष अभी है
मन ही मन मैं आंक रहा हूँ
तन की तन से दूरी है पर
मन का है मन से चिर बंधन
मेरी सांसों मे सुरभित है
तेरी सांसों का ही चंदन
अब तो सावन की ऋतु भी
मुझको बिलकुल नहीं सुहाती
नीर लिये नयनों के नभ में
कल्पित सपने टांक रहा हूँ
कवि दीपक गुप्ता
9811153282 - 9311153282
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नाम तुम्हारे लिख दी पाती
और प्रतीक्षारत उत्तर में
बादल का मन झांक रहा हूँ
अक्सर मुझसे बतियाता है
मस्त हवाओं का हरकारा
आते- जाते बतला जाता
क्या है प्रियतम हाल तुम्हारा
झंझाओं को झेल रही है
नित दीपक की जलती बाती
कितना जीवन शेष अभी है
मन ही मन मैं आंक रहा हूँ
तन की तन से दूरी है पर
मन का है मन से चिर बंधन
मेरी सांसों मे सुरभित है
तेरी सांसों का ही चंदन
अब तो सावन की ऋतु भी
मुझको बिलकुल नहीं सुहाती
नीर लिये नयनों के नभ में
कल्पित सपने टांक रहा हूँ
कवि दीपक गुप्ता
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Tuesday, July 7, 2009
फिर नए शेर ......
बनाकर अपनी दुनिया को उसे बर्दाश्त भी करना
खुदा मेरे मैं तेरे हौसले की दाद देता हूँ
परिंदे ने कहा तू कैद रख या कर रिहा मुझको
मैं अपनी ज़िन्दगी का हक़ तुझे, सैय्याद देता हूँ
मैं दुःख से घिर गया तो गैब से आवाज ये आयी
सुखों की छावं मैं अक्सर दुखों के बाद देता हूँ.....
कवि दीपक गुप्ता
9811153282 - 9311153282
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खुदा मेरे मैं तेरे हौसले की दाद देता हूँ
परिंदे ने कहा तू कैद रख या कर रिहा मुझको
मैं अपनी ज़िन्दगी का हक़ तुझे, सैय्याद देता हूँ
मैं दुःख से घिर गया तो गैब से आवाज ये आयी
सुखों की छावं मैं अक्सर दुखों के बाद देता हूँ.....
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Wednesday, June 24, 2009
नए शेर ......
ज़माने में बिना मतलब के मतलब कौन रखता है
किसी के ज़ख्म पे मरहम भला अब कौन रखता है
वो इक विश्वास ही तो है उसे मानो न मानो तुम
फ़लक पे ये उजाला और ये शब् कौन रखता है
ये मेरी ज़िन्दगी के रास्तों पे उलझनें हर पल
मैं तुझसे पूछता हूँ तू बता रब, कौन रखता है
कवि दीपक गुप्ता
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किसी के ज़ख्म पे मरहम भला अब कौन रखता है
वो इक विश्वास ही तो है उसे मानो न मानो तुम
फ़लक पे ये उजाला और ये शब् कौन रखता है
ये मेरी ज़िन्दगी के रास्तों पे उलझनें हर पल
मैं तुझसे पूछता हूँ तू बता रब, कौन रखता है
कवि दीपक गुप्ता
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